"लॉकडाउन में शिक्षकों की अहमियत"

बिहार ब्यूरो (पटना) :: सुजाता प्रसाद भारत युवाओं का देश है और ये हैं तो देश है। देश के इन भावी नागरिकों की, इन नौनिहालों की सुरक्षा का इंतजाम हमारी सरकार ने बड़ी ही संजीदगी से किया है। इनका सुरक्षित होना नितांत आवश्यक है क्योंकि आपदा की इस घड़ी के बाद कल राष्ट्र इनका इंतजार कर रहा होगा। सरकार ने एक जिम्मेदार अभिभावक के रूप में सबसे पहले देश के बच्चों को ही लॉकडाउन पालन करने का आदेश देकर हर मां को उनकी संतानों को सौंप देने का बहुत ही सुधि फैसला लिया। देश की मांओं को संभावित आशंकाओं से छुटकारा मिला और देश इस ओर से निश्चिंत हो गया कि उनके भावी नागरिक सुरक्षित हैं।

पिछले दिनों ट्विटर पर एक बहुत ही सुंदर सी पेंटिंग पोस्ट की गई थी। वह पेंटिंग ऐश्वर्या-अभिषेक बच्चन की प्यारी बेटी और बिग बी अमिताभ बच्चन की लाडली पौत्री आराध्या बच्चन की थी। जिसमें डियर आराध्या ने "कोरोना कर्मयोद्धाओं" की तस्वीरों को अपनी नन्हीं उंगलियों से उकेरा फिर उनमें रंग भरा है और उन्हें सम्मानित किया है। जिन वारियर्स के उनके प्रोफेशन के सिंबल यानी उनके पदों को प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक थे, उन्हें उनके प्रतिकात्मक रूप में अपनी ड्रॉइंग में स्थान दिया और जिनका कोई सिंबल ही नहीं था उन्हें लिख कर प्रजेंट कर दिया, छोटी सी बच्ची ने। प्यारी आराध्या की सम्मान की उस भावना ने ना जाने कितने संवेदनशील राष्ट्रनिर्माताओं की होठों पर मुस्कान ला दिया होगा और कितनों की आंख भर आई होगी। हालांकि जिस दिन यह मैसेज पोस्ट की गई थी, उस दिन शिक्षक दिवस नहीं था। निश्चित ही बेबी आराध्या ने अपने शिक्षकों द्वारा दी गई स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उनके द्वारा दी गई नैतिक शिक्षा को भी आत्मसात किया है। वैसे भी आराध्या खुद एक उच्च बौद्धिक परिवार से आती हैं और प्रथम गुरु उनकी मां स्वयं एक बौद्धिक महिला हैं।

इस कोरोना काल में लॉकडाउन टू के बाद हमने देखा और सुना होगा कि शिक्षकों को लोग जाने-अनजाने अपनी नादानियों में अपनी बेवकूफी भरे शब्दों से आहत कर रहे थे, यह सोचकर कि लॉकडाउन में शिक्षकों की क्या अहमियत? शिक्षक जिसकी दी गई शिक्षा से समाज की अनेक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। शिक्षक एक ज्ञान के दीपक की भांति अपने विद्या का प्रकाश फैला सकता है। ऐसे में यह विचारणीय प्रश्न है कि शिक्षक आज हाशिए पर कैसे आ गए और लोगों को बेतुकी बातें करने की छूट कैसे मिल गई? सच में अभिभावक और स्कूल प्रशासन के बीच में हमारे ये शिक्षक कब और कैसे आ गए, कुछ समझ में नहीं आया। अभिभावकों की स्कूल प्रशासन के खिलाफ आवाज तो पहले से ही उठती रही है, और भविष्य में उठती भी रहेगी। क्योंकि ऐसा तो गुरूकुल परंपरा के खत्म होने के बाद से होता ही आ रहा है। यहां इस समय सैलरी या नॉन सैलरी की बात करना ही गैरजिम्मेदाराना व्यवहार होगा। क्योंकि सभी को अपने हिस्से का संघर्ष खुद ही करना होता है, सबको अपना दर्द खुद ही ढ़ोना होता है। सरकारी आदेश पर शिक्षक भी तो कई अन्य कार्यों में संलग्न हैं। एक उदाहरण अभी दिल्ली एमसीडी के शिक्षकों का है जिन्हें राशन बांटने के काम में लगाया गया था। लेकिन अब उनके द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए पीपीई किट की मांग की जा रही है, क्योंकि उनमें से अपना कर्तव्य निभाते हुए कोरोना संक्रमित होने के बाद एक शिक्षिका की मौत हो गई।

फिर भी इतना कुछ सुनने के बाद भी बच्चों को अपने हाथों से संवारने वाले, शिक्षित करने वाले ये शिक्षक चुप रहे और चुपचाप अपने काम में लगे रहे। और तो और सोशल मीडिया पर कभी दावा नहीं किया कि हमारा काम भी सराहनीय है। यही तो इनकी महानता है। वास्तव में इनका व्यक्तित्व ऐसा होता है जो अपना कर्तव्य करना जानते हैं बेकार की बातें करना नहीं। शिक्षकों का कोई सिंबल नहीं है, क्योंकि ये सिंबल बनाते हैं ना। छात्र अपने प्रोफेशन का चुनाव अपने हालात, अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और सबसे महत्वपूर्ण रूप से अपनी प्रतिभा के ग्राफ के अनुसार करते हैं। और छात्रों को शिक्षित करने और उनके सपनों को पूरा करने में शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान होता है। इनकी ही छत्रछाया में पलकर, इनके सानिध्य में पढ़कर बच्चे कई अन्य एवं विभिन्न उच्चासिन पदों को सुशोभित करते हैं। शिक्षकों के ये प्रतिनिधि देश सेवा में अपना योगदान दे रहे हैं, क्या अपने शिष्यों पर इन्हें गर्व नहीं होगा? आज स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी के टीचर्स, रीडर्स, प्रोफेसर्स सभी सरकारी आदेशों का पालन करते हुए उनकी दी हुई एडवाइजरी के अनुसार अपने अपने काम कर रहे हैं। नियत टाइम टेबल से ऑनलाइन क्लासेस ले रहे हैं। आगे की प्रक्रिया भी इनकी निगरानी में सुचारू रूप से चल रही है। हां ये बात अलग है कि ऑनलाइन टीचिंग क्लास रूम स्टडी जितनी सार्थक नहीं है। फिर भी आई हुई इस विषम परिस्थिति में इन बच्चों के आने वाले दिनों के लिए जो भी जरूरी काम हैं सब किए जा रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर के शिक्षक भी बिना हानि लाभ की परवाह किए बच्चों की हर समस्या का समाधान करने के लिए आगे आ रहे हैं। अपने छात्रों के उज्जवल भविष्य के लिए कोई भी काम करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। समय के चक्र में हम सबका योगदान अतुलनीय है। यह तो समय ही तय करता है कि कब किसे कहां और कैसे अपनी भागीदारी देनी है।

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